अध्याय ३
शान शुरुवात से ही, याने बचपन से ही दूसरों से अलग था. और हाल ही में एक जिम्मेदार वयस्क के नाते भी उसने एक अलग सा निर्णय ले लिया था, धर्मरहित जीवन जीने का. वह केवल एक धर्म से बंधा रहना नहीं चाहता था. उसने जल्दी ही अपने नये धर्म को, जिसका कोई नाम नहीं था, एक परिभाषा दे दी. परिभाषा सिर्फ एक वाक्य भर की थी. और वह एक वाक्य था, “खुद के लिए और दूसरों के लिये अच्छा महसूस करो, अच्छा सोचो और अच्छा करो.” यही मानव-धर्म है. कितनी सरलता है धर्म की इस परिभाषा में. पर शान ने इसका नाम ‘धर्म’ नहीं रखा. इसे वह उसके जीवन जीने का एकतम ‘मार्ग-दर्शक सिद्धांत’ मानता था. लाख कोशिशों के बाद भी वह खुद को जता नहीं पाया कि किसी एक धर्म का पूर्णतः पालन करके वह जीने के अंदाज़ में कोई और अधिक सुधार ला पाएगा. उसने अब तक यह देखा था कि हर एक संगठित धर्म कुछ ऐसी रूढ़ियों, परम्पराओं, सोच और नियमों में उसे अपनाने वाले को जकड़ लेता है, जो उसे पीछे खींचती हैं, जीवन में आगे ले जाने के बजाय. और शान पीछे जाने वालों में से नहीं था. छुटपन से लेकर आज तक शान ने, कई सारी सामाजिक मान्यताओं को भी, जो उसके नज़रिये में कुरी...